News UDI | गढ़वा : झारखंड राज्य के गढ़वा थेजिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की लाइफलाइन कही जाने वाली 108 एंबुलेंस सेवा खुद ही बीमार पड़ गई है। सरकारी फाइलों में भले ही जिले के पास 27 एंबुलेंस का बेड़ा मौजूद हो, लेकिन धरातल पर हकीकत यह है कि मरीजों को अस्पताल पहुँचाने वाली ये गाड़ियां अब खुद कबाड़खानों की शोभा बढ़ा रही हैं। आलम यह है कि आपात स्थिति में समय पर इलाज मिलना तो दूर, एंबुलेंस के बीच रास्ते में दम तोड़ देने के डर से ग्रामीण अब इन पर भरोसा करने से कतराने लगे हैं।
सदर अस्पताल का सबसे बुरा हाल, निजी वाहनों की चांदी
जिले के सबसे बड़े अस्पताल, सदर अस्पताल गढ़वा की स्थिति सबसे चिंतनीय है। यहाँ 4 एंबुलेंस पूरी तरह से खराब होकर सड़ रही हैं। इसके अलावा रंका, डंडई, कांडी, धुरकी, रमकंडा और भवनाथपुर जैसे क्षेत्रों में भी एक-एक एंबुलेंस पूर्ण रूप से कबाड़ में तब्दील हो चुकी है।
इस बदहाली का सबसे बड़ा खामियाजा जिले के गरीब तबके को भुगतना पड़ रहा है। गंभीर स्थिति में सरकारी एंबुलेंस न मिलने पर उन्हें निजी वाहनों को भारी-भरकम राशि चुकानी पड़ रही है, जो उनकी आर्थिक कमर तोड़ रहा है।
रेंगती गाड़ियां और ‘धक्का मार’ तकनीक

विभागीय आंकड़ों का विश्लेषण करें तो डराने वाली तस्वीर सामने आती है :
- 7 एंबुलेंस ऐसी हैं, जो बमुश्किल 20 से 30 किमी की दूरी तय कर पाती हैं।
- 8 एंबुलेंस केवल स्थानीय स्तर पर ‘किसी तरह’ रेंग रही हैं।
- 2 एंबुलेंस (सदर अस्पताल और भंडरिया) दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद महीनों से मरम्मत की राह देख रही हैं।
जानकारों का कहना है कि यदि किसी मरीज को गंभीर स्थिति में लंबी दूरी (जैसे रांची) रेफर किया जाए, तो ये गाड़ियां रास्ते में कभी भी धोखा दे सकती हैं। ऐसी स्थिति में मरीज की जान जाना लगभग तय है।
बदहाली का गणित : एक नज़र में
| श्रेणी | संख्या |
| पूर्ण रूप से कबाड़ | 10 |
| 20-30 किमी चलने लायक | 07 |
| सिर्फ लोकल चलने योग्य | 08 |
| दुर्घटनाग्रस्त (खड़ी) | 02 |
| कुल बेड़ा | 27 |
सुदूरवर्ती क्षेत्रों में बढ़ता जोखिम
गढ़वा जिला भौगोलिक रूप से काफी फैला हुआ है। सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों से जिला मुख्यालय तक पहुंचने में घंटों लगते हैं। ऐसे में एंबुलेंस का ‘कंडीशन’ में न होना किसी आपराधिक लापरवाही से कम नहीं है। कांडी, रंका, रमना और श्री बंशीधर नगर जैसे इलाकों में मरीज भगवान भरोसे हैं।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
इस मामले में विभाग अपनी कमियां स्वीकार तो कर रहा है, लेकिन समाधान कब होगा यह अब भी सवाल है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार :
“जिले में एंबुलेंस की स्थिति की समीक्षा की जा रही है। खराब गाड़ियों की सूची उच्चाधिकारियों को भेज दी गई है। जल्द ही नई वैकल्पिक व्यवस्था या मरम्मत का कार्य सुनिश्चित किया जाएगा।”
सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? जब तक ये फाइलें दफ्तरों के चक्कर काटेंगी, तब तक कितने गरीब अपनी जान जोखिम में डालते रहेंगे?














