News UDI ,रांची : झारखंड के सरकारी महकमों में नौकरियों की हकीकत डराने वाली है। राज्य में युवाओं के भविष्य पर ‘वेकेंसी’ का ग्रहण लगा हुआ है। विधानसभा में सोमवार को जो आंकड़े सामने आए, उसने सरकार के दावों की पोल खोलकर रख दी है। राज्य में 3,51,968 स्वीकृत पद हैं, लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इनमें से 1,64,358 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब आधा सरकारी ढांचा खाली कुर्सियों के भरोसे चल रहा है।
आंकड़ों का आइना: किस विभाग में कितनी ‘खाली’ कुर्सियां?
सदन में पेश आंकड़ों के अनुसार, सबसे बुरा हाल शिक्षा और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों का है। नीचे दी गई तालिका राज्य की बदहाल व्यवस्था को दर्शाती है:
| विभाग | स्वीकृत पद | कार्यरत कर्मी | रिक्त पद |
| स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता | 1,10,159 | 58,017 | 52,142 |
| गृह विभाग (पुलिस आदि) | 1,04,449 | 73,375 | 31,074 |
| कृषि एवं पशुपालन | 13,451 | 3,228 | 10,223 |
| कल्याण विभाग | 4,900 | 1,823 | 3,077 |
| पेयजल एवं स्वच्छता | 3,059 | 1,692 | 1,367 |
“40 साल लग जाएंगे नियुक्तियां भरने में!”
भाजपा विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने सदन में सरकार को घेरते हुए कड़े सवाल दागे। उन्होंने गणित समझाते हुए कहा कि अगर सरकार 6 साल में महज 8% रिक्तियां ही भर पाई है, तो इस रफ्तार से राज्य के सभी खाली पदों को भरने में 40 साल लग जाएंगे। तिवारी ने तंज कसते हुए पूछा— “क्या सरकार दिवालिया हो गई है, जो नियुक्तियां नहीं करना चाहती?”
सत्ता पक्ष का बचाव: “विरासत में मिली है ये रिक्ति”
संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सरकार का बचाव करते हुए सारा ठीकरा पिछली सरकारों और सिस्टम पर फोड़ दिया। उनके मुख्य तर्क थे:
- यह रिक्ति पिछले 20-25 वर्षों से चली आ रही है।
- सरकार ने अब तक 30 हजार पदों पर बहाली की है।
- आउटसोर्सिंग की जिस व्यवस्था को भाजपा ने शुरू किया था, वर्तमान सरकार उसे धीरे-धीरे खत्म कर रही है।
- सरकार अपने आर्थिक संसाधनों के हिसाब से नियुक्तियां कर रही है।
तीखे सवाल: क्या बजट नहीं तो नौकरी नहीं?
जब मंत्री ने ‘आर्थिक संसाधन’ का रोना रोया, तो भाजपा विधायक सीपी सिंह ने सीधे पूछा— “क्या संसाधन नहीं होने पर सरकार नियुक्तियां ही नहीं करेगी?” बड़ा सवाल: एक तरफ राज्य का युवा बेरोजगारी के आलम में सड़कों पर है, वहीं दूसरी तरफ विभाग खाली पड़े हैं। अगर 1.64 लाख पदों को भरने के लिए सरकार के पास ‘संसाधन’ नहीं हैं, तो विकास के दावों में कितना दम है?








