News UDI : एक तरफ सरकार दावा कर रही है कि देश में एलपीजी की कोई कमी नहीं है, वहीं दूसरी तरफ महज 6 दिनों के भीतर तीन बार बुकिंग नियमों को बदलकर उपभोक्ताओं की मुसीबतें बढ़ा दी गई हैं। मिडिल ईस्ट के युद्ध और वैश्विक तनाव का बहाना बनाकर अब ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अगली बुकिंग का समय 45 दिन कर दिया गया है। जनता अब सवाल पूछ रही है— अगर गैस की कमी नहीं है, तो फिर ये पाबंदियां क्यों?
ग्रामीणों के लिए ‘दोहरी मार’, 45 दिन का इंतजार क्यों?
सरकार का सबसे चौंकाने वाला फैसला ग्रामीण क्षेत्रों को लेकर है। 12 मार्च से लागू नए नियम के अनुसार, ग्रामीणों को अब डेढ़ महीने (45 दिन) के अंतराल पर ही दूसरा सिलेंडर मिलेगा।
- सिंगल सिलेंडर की मजबूरी : ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश गरीब उपभोक्ताओं के पास केवल एक ही सिलेंडर (DBC की कमी) है। 14.2 किलो का सिलेंडर एक औसत परिवार में 25 से 30 दिन चलता है। ऐसे में 45 दिन के नियम ने उनके चूल्हे पर संकट खड़ा कर दिया है।
- जमाखोरी का तर्क गले नहीं उतरा : जानकारों का कहना है कि जिस ग्रामीण के पास एक ही सिलेंडर है, वह भला जमाखोरी कैसे कर सकता है? जमाखोरी का आरोप लगाकर ग्रामीणों को सजा देना तर्कसंगत नहीं लगता।
6 दिन में 3 बार बदलाव: सरकार की नीयत पर उठते सवाल
पेट्रोलियम मंत्रालय और तेल कंपनियों के फैसलों में दिख रही हड़बड़ाहट ने जनता के बीच डर पैदा कर दिया है:
- 06 मार्च: पहली बार लॉक-इन पीरियड 21 दिन तय हुआ।
- 09 मार्च: शहरी क्षेत्रों के लिए इसे बढ़ाकर 25 दिन किया गया।
- 12 मार्च: अब ग्रामीण क्षेत्रों को 45 दिन के दायरे में झोंक दिया गया।
बड़ा सवाल: अगर सप्लाई पर्याप्त है, तो सरकार को बार-बार नियम बदलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या यह “सब ठीक है” के सरकारी दावे और “जमीनी हकीकत” के बीच बढ़ती खाई का संकेत है?

शहरी उपभोक्ता भी परेशान, एजेंसियों पर भारी भीड़
शहरों में भी स्थिति सामान्य नहीं है। 25 दिन के अनिवार्य अंतर के कारण लोग डरे हुए हैं। जिन परिवारों में सदस्य अधिक हैं, वहां 25 दिन से पहले गैस खत्म होने पर अब ‘ब्लैक’ में सिलेंडर खरीदने की नौबत आ सकती है। गैस एजेंसियों के बाहर लग रही लंबी कतारों को संभालने के लिए पुलिस बल का सहारा लेना सरकार की ‘आपूर्ति पर्याप्त है’ वाली दलील पर सवालिया निशान लगाता है।
निष्कर्ष: समाधान या नई समस्या?
रसोई गैस अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की मजबूरी बन चुकी है। ऐसे में बिना किसी ठोस विकल्प के बुकिंग के दिनों में भारी बढ़ोतरी करना, जनता को वापस ‘मिट्टी के चूल्हों’ की ओर धकेलने जैसा है।
जनता की राय : “सरकार कहती है गैस की कमी नहीं है, फिर बुकिंग क्यों रोक रही है? गरीब आदमी 45 दिन तक एक सिलेंडर कैसे चलाएगा?” — एक पीड़ित उपभोक्ता








