News UDI | गढ़वा : झारखंड का गढ़वा जिला इन दिनों खेती-किसानी के लिए नहीं, बल्कि कृषि विभाग में पसरे ‘भ्रष्टाचार के कीचड़’ के कारण सुर्खियों में है। विभाग की योजनाओं में बंदरबांट और रसूखदारों को ‘रेवड़ी’ की तरह पद बांटने का एक ऐसा खेल सामने आया है, जिसने सरकारी सिस्टम की साख पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
ताजा मामला मझिआंव प्रखंड का है, जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक ‘उद्यान मित्र’ को विभाग ने ऐसा सबक सिखाया कि पिछले सात वर्षों से उसका मानदेय ही डकार लिया गया।
आवाज उठाने की सजा: 7 साल से मानदेय को तरस रहे आनंद दुबे
मझिआंव प्रखंड के आछोडीह गांव निवासी आनंद कुमार दुबे ने जिला कृषि पदाधिकारी को आवेदन सौंपकर विभाग के अधिकारियों की पोल खोल दी है। आनंद 2011 से किसान मित्र के रूप में कार्य कर रहे थे और 2017-18 में आम सभा के माध्यम से उन्हें विधिवत ‘उद्यान मित्र’ चयनित किया गया था।
पीड़ित आनंद दुबे के गंभीर आरोप:
- गायब कर दिए दस्तावेज: आनंद का दावा है कि उनके चयन से संबंधित सरकारी फाइलों को साजिश के तहत गायब कर दिया गया है।
- जेब से खर्च, पर फूटी कौड़ी नहीं: पिछले सात सालों से विभागीय कार्यों और किसान मेलों में किसानों को ले जाने का खर्च आनंद ने अपनी जेब से वहन किया, लेकिन विभाग ने उन्हें एक रुपया भी नहीं दिया।
- रिश्वत का खेल: आरोप है कि लिपिक श्रवण कुमार और अन्य अधिकारियों ने भुगतान के बदले रिश्वत की मांग की। रिश्वत न देने पर 2020 से 2025 के बीच उनके द्वारा अनुशंसित किसानों को पंपसेट के लाभ से वंचित रखा गया।
- पुराना हिसाब भी बाकी: साल 2012-13 में श्रीविधि खेती के तहत 350 किसानों और आनंद दुबे की प्रोत्साहन राशि भी डकार ली गई।
विभाग के ‘सिंडिकेट’ पर सीधा वार
आनंद दुबे ने अपनी प्रताड़ना के लिए सीधे तौर पर आत्मा के प्रभारी उप निदेशक योगेंद्रनाथ सिंह, जितेंद्र उपाध्याय, बीटीएम धनंजय सिंह और लिपिक श्रवण कुमार को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने के कारण ये अधिकारी उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।
नियमों की धज्जियां: ‘गुप्त चयन’ और अपनों को उपकार
कृषि विभाग का कारनामा यहीं नहीं थमता। विभागीय गाइडलाइन के अनुसार, केवल कार्यरत किसान मित्रों को ही ‘उद्यान मित्र’ बनाया जा सकता है। लेकिन मझिआंव, बरडीहा और कांडी प्रखंडों में बीटीएम ने ‘पैसे के खेल’ में नियमों को ताक पर रख दिया।
अवैध बहाली का सच: ऐसे लोगों को उद्यान मित्र बना दिया गया जो कभी किसान मित्र थे ही नहीं। फर्जी तरीके से चयनित इन लोगों को अदरक, ओल और गरमा मक्का के बीज भी बांटने के लिए दे दिए गए।
जैसे ही इस ‘गुप्त चयन’ और फर्जीवाड़े की खबर राज्य मुख्यालय तक पहुंची, विभाग में हड़कंप मच गया। खुद को फंसता देख जिला कृषि विभाग ने आनन-फानन में तीनों प्रखंडों के उद्यान मित्रों का चयन निरस्त कर अपनी खाल बचाने की कोशिश की है।
करोड़ों के गबन की आशंका, अब कोर्ट की शरण में पीड़ित
आनंद दुबे ने चेतावनी दी है कि कृषि विभाग में करोड़ों रुपये की फर्जी निकासी और गबन के कई और मामले दबे हुए हैं। उन्होंने साफ किया कि यदि निष्पक्ष जांच कर उनका बकाया भुगतान नहीं किया गया और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे न्याय के लिए न्यायालय (कोर्ट) का दरवाजा खटखटाएंगे।
विभाग का पक्ष: गलती मानी, बीटीएम को शो-काज
इस पूरे मामले पर जिला कृषि पदाधिकारी, गढ़वा खुशबू पासवान ने स्वीकार किया कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई थी। उन्होंने कहा:
“आम सभा के माध्यम से उद्यान मित्र का गलत चयन हो गया था, जिसे अब निरस्त कर दिया गया है। राज्यादेश की अवहेलना करने वाले संबंधित बीटीएम को चिह्नित कर उन्हें शो-काज (कारण बताओ नोटिस) जारी किया जा रहा है।”
संपादकीय टिप्पणी : क्या महज एक ‘शो-काज’ सात साल के हक की लड़ाई लड़ रहे एक किसान मित्र को न्याय दिला पाएगा? या फिर जांच की फाइलें भी उन्हीं कागजातों की तरह गायब हो जाएंगी जिनका जिक्र पीड़ित ने किया है?





